मेरे शब्द मेरी सच्चाई

हर दिन कुछ खास है,हर दिन नया एहसास है।
बीते दिन की याद बस्ते में समेट घर से रोज़ निकलता हूँ।
बेहतर कल को तलाशता दर-बदर भटकता हूँ।
हर ठोकर का अपना मज़ा है, ज़िंदगी के सच के करीब पहुँचा देती है।
जानता हूँ, किसी दिन भटकते भटकते मंज़िल भी हाथ आ जाएगी।
किस्मत किसी दिन तो मुझपर भी मुस्कराएगी।

रिशतों को मैंनै टूटकर बनते देखा है,
दिलों को पास आते दूर जाते देखा है,
किसी अपने को पराया,और पराये को अपना बनते देखा है।
किसी को खोकर पाते और किसी को पाकर भी सबकुछ खोते देखा है।
किसी को गम में मुस्कराते और किसी को हँसकर फिर रोते देखा है।
ख्वाब को रोज़ बनते और बनकर बिखरते देखा है।

ज़िंदगी को खुलकर जिया है, हर एहसास महसूस किया है।
मेरे शब्दों में लिखी मेरी ज़िंदगी की सच्चाई है।
मेरे जाने का गम मत करना कभी दुनिया वालो,
याद आऊ तो इन पन्नों को पलट लेना,
मैं फिरसे जी उठुँगा।

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Author: Paranjaya

What I have failed to speak, I have succeeded to write! - Paranjaya Mehra

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