यादें बात करती हैं

बातों-बातों में उस रात ये बात निकली,
यारों की बारात में यादों की बारात निकली।
वो बोला,”गुस्ताखी खास करती हैं।
फिर दिल-ए-फरियाद करती हैं।
यादों से पूछो यादें क्यों बात करती हैं?”

यादें शरमाई, बातों – बातों में​ यादों का पैगाम आया।
शाम-ए-शराब थी वो,
फिर भी बीच में हुस्न-ए-शबाब आया। ।
यादों का वो पैगाम था,
जसबातों का बवंडर उसका दूसरा नाम था।

पैगाम दिल तक पहुंचा​ तो पहले दिल थोड़ा शरमाया,
फिर दिल बहुत घबराया,
पर प्यार का वो मारा,
चिट्ठी खोले बिना रह नहीं पाया।

यादों ने लिखा था,”याद कर वो कुछ दिन,
हाथ तूने उसके प्यार का थामा था ।
साथ रहने का वादा करा था,
सात जनमों तक निभाना था।
उस प्यार से मुंह मोड़, सारे रिशते पीछे छोड़,
क्यों चला आया परदेस उसका दिल तोड़? ”

यादें फिर बोली,”जिन रिश्तों को पीछे छोड़ आया है,
उन्हें मुझ में बुनने का आज तुझे हक नहीं।
दिल में तू उसके आज भी है,
बस ज़बान पर तेरा अक्स नहीं।
उसके आज के आयने में हर सवाल का जवाब तू था,
पर आज उसके हर जवाब पर सवाल तू है।”

“कल उससे मुंह मोड़ आया था,
आज मुझसे मुंह मोड़ ले।
कल उसका हाथ छोड़ आया था,
आज मुझसे भी तू नाता तोड़ ले।
जा अब जीले, परदेस में नई यादों से दिल तू जोड़ ले।”

-Paranjaya Mehra

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Author: Paranjaya

What I have failed to speak, I have succeeded to write! - Paranjaya Mehra

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